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कासगंज के इतिहास में पहली बार राजपूत बाहुल्य इस गाँव मे किसी दलित की बारात में पुलिस की निगरानी में दूल्हा घोड़े की बग्घी में बैठकर अपनी बारात लेकर पूरे गाव में घूमा,सुरक्षा के रहे कड़े बंदोबस्त






कासगंज के निजामपुर गाव में हाथरस के दलित संजय जाटव की शादी कासगंज की शीतल के साथ बड़ी धूमधाम से हुई। कासगंज के इतिहास में पहली बार राजपूत बाहुल्य इस गाँव मे किसी दलित की बारात में दूल्हा घोड़े की बग्घी में बैठकर अपनी बारात लेकर पूरे गाव में घूमा।

आजादी के बाद भारत का संविधान लागू होने पर सभी को समान अधिकार दिए गए। जाति, धर्म,भाषा,सम्प्रदाय,रंग,भेद आदि के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न करने की व्यवस्था लागू की गई।
परंतु दुर्भाग्य यह रहा कि वास्तविक धरातल पर भारत मे यह संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह से लागू नही हो सकी। आरोप है कि कासगंज जिले के निजामपुर गाव में ठाकुरो और अन्य सवर्ण जातियों के वर्चस्व के चलते आजादी के बाद से अबतक किसी भी दलित की बारात दूल्हे के धोड़ी और बग्घी पर बैठकर नही चढ़ने दी गई। इक्कीसवी सदी में इस भेदभाव के खिलाफ संजय जाटव ने आवाज उठाने की हिम्मत की और अपनी शादी में पूरे गाँव मे बारात चढ़ाने और घुड़चढ़ी की रश्म निभाने की कासगंज जिला प्रशाशन से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी तक का दरवाजा खटखटाया। संजय की मेहनत रंग लाई और गाँव मे छुटपुट शुरुआती विरोध के बाद  कासगंज के जिला अधिकारी आर पी सिंह ने दोनों पक्षो को बुलाकर वार्ता कर दलित की बारात गाव में घुमाने और घुड़ चढ़ी की रश्म अदा करने को राजी कर लिया ।बाकायदा बारात गाँव मे किस किस रास्ते से गुजरेगी उसके लिए दोनों पक्षो की सहमति से एक रुट चार्ट भी बनाया गया और उस पर दोनों पक्षो और ग्राम प्रधान के दस्तखत भी कराए गए। अंततः समझाने बुझाने पर ठाकुर पक्ष भी इस समझौते पर राजी हो गया। हालांकि आरोप यह भी लगा कि इस प्रकरण में ठाकुरो द्वारा दलित की बारात न चढ़ने देने के मामले को एक वर्ग विशेष ,पार्टी और कुछ नेताओं द्वारा अत्यधिक तूल जान बूझकर मीडिया हाइप प्राप्त करने के लिए दिया गया जबकि जिला अधिकारी कासगंज से प्रथम वार्ता के बाद ही दोनों पक्षो के बीच बारात चढ़ाने को लेकर स्वेच्छा से लिखित समझौता भी हो गया था जिसपर दोनों पक्षो के हस्ताक्षर भी हैं ।
जिला अधिकारी कासगंज के अथक प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि जो ठाकुर इस दलित शादी का विरोध कर रहे थे वो ही अब शीतल को गाँव की बेटी कहकर पुकारने लगे और शादी के सहयोग करने की बात कहने लगे।गाव में समरसता और सहयोग का वातावरण बनने लगा। इस बीच 15 जुलाई को संजय और शीतल की यह चर्चित शादी भी सम्पन्न हो गई। इस को शकुशल सम्पन्न कराने के लिए पूरे गाँव को छावनी में तब्दील कर दिया गया था और कासगंज जिले के बड़े पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी इसकी मोनिटरिंग कर रहे थे ।
इस पूरे परिदृश्य में जो एक बात मुझे महसूस हुई वह यह कि जो बीजेपी दलित एजेंडे को धार देने के लिएअभी कुछ दिनों पहले ही पूरे उत्तर प्रदेश में दलितों के घर भोजन कर रात्रि प्रवास करने का नाटक कर रही थी और अपने को दलितों का सबसे बड़ा हितैसी दर्शा रही थी उसी बीजेपी का कोई भी बड़ा नेता या पदाधिकारी दलित की इस शादी में शामिल तक नही हुआ,जबकि अन्य कई राजनैतिक दलों के नेताओ ने इसमें शिरकत की। यहाँ पर मुझे बीजेपी का सबक साथ ,सबका विकास का नारा सिर्फ नारा ही दिखाई दिया। सामाजिक समरसता और भाई चारे के चलते क्या यहाँ के सांसद,विधायक या जिले के अन्य पदाधिकारियों को दलित की इस ऐतिहासिक शादी में शिरकत नही करनी चाहिए थी? जनता को वो दृश्य भी याद होगा कि कुछ माह पहले ही कासगंज की पटियाली विधान सभा छेत्र में किस तरह एटा के सांसद और कासगंज और एटा के कुछ विधायक एक दलित के घर मे रात्रि विश्राम के तहत सोने का नाटक करते हुए फोटो सेसन करा रहे थे?  स्थानीय बीजेपी के नेताओ और रणनीतिकारों की इस दलित शादी की उपेक्षा से शीर्ष बीजेपी नेताओं और भारत के  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी,बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के दलितों को बीजेपी के करीब लाने के एजेंडे को काफी धक्का लगा है । हो सकता है कि बीजेपी इस पूरे मामले की समीक्षा भी करे। इससे बीजेपी के तथाकथित दलित प्रेम पर भी उंगली उठने लगी है, आज के दौर में केवल दिखावा करके किसी को भरमाया नही जा सकता क्योकि ये पब्लिक है ये सब जानती हैं ।
इस शादी पर देश भर के मीडिया की भी निगाहे थी। कुछ राजनैतिक दल और उनके नेता इसे राजनीतिक रंग भी देना चाह रहे थे, राजपूतो को उनकी आन बान शान का वास्ता देकर भड़काया भी जा रहा था परंतु कसगंज के जिला अधिकारी आर पी सिंह की कुशलता और प्रबंधन ने सभी के मंसूबो को ध्वस्त कर न केवल भारत के संविधान की रक्षा की वरन केंद्र और राज्य सरकार की मंशा के अनुरूप दलितों को उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों की भी रक्षा कर उनका पूरा सम्मान रखा। आखिर यही तो हमारी विविध सांस्कृतिक विरासत की ताकत है।
आजादी के बाद भारत मे और उत्तर प्रदेश में कितनी ही सरकारे आयी और चली गई परंतु किसी के कार्यकाल में भी कासगंज के इस गाँव मे दलित को अपनी शादी में  घुड़ चढ़ी करने और सभी की तरह अपनी बारात को गाजे बाजे के साथ पूरे गाँव मे घुमाने नही दिया गया। ऐसा पहली बार प्रदेश की योगी सरकार में ही संभव हो पाया जिसके लिए प्रदेश सरकार और कासगंज के जिला अधिकारी की मुक्त कंठ से प्रशंशा करनी ही होगी। उम्मीद है कि कासगंज के जिला अधिकारी आर पी सिंह ने ये जो लकीर खींची है  पूरे देश मे इससे सबक लेकर आने वाली पीढियां इसी लीक पर चलकर भारत मे विविधता में एकता की डोर को और मजबूत करेंगी और हमारे गाँवो में सहयोग, समन्वय और सामंजस्य बना रहेगा,यही तो हमारे लोकतंत्र की ताकत है।

रिपोर्ट फहीम/अनुज

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