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फिरोजाबाद के टूंडला में मनाया जाता है तीन दिवसीय दुर्गा पूजा महोत्सव, महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमीं को सजता है विशाल पांडाल

फिरोजाबाद। दुर्गा पूजा महोत्सव पश्चिम बंगाल में बड़ी धूमधाम और हर्षोल्लास से मनाया जाता था। देश के अंदर दुर्गा पूजा महोत्सव में पश्चिम बंगाल का प्रथम स्थान है। बंगाली समुदाय द्वारा ही दुर्गा पूजा महोत्सव की शुरूआत की गई थी। फिरोजाबाद के टूंडला में उस समय काफी संख्या में बंगाली समुदाय के लोग नौकरी करते थे। उन्होंने ही नगर में दुर्गा पूजा महोत्सव का शुभारंभ किया था। उसके बाद आज वर्तमान स्थिति यह है कि इस छोटे से नगर मेें दुर्गा पूजा महोत्सव का वृहद रूप से आयोजन किया जाता है।
करीब 70 वर्ष पूर्व शुरू हुआ आयोजन
टूंडला स्टेशन बनने पर काफी संख्या में बंगाली समुदाय के लोग यहां नौकरी करने के लिए आए। उन्होंने रेलवे परिसर में छोटे स्तर पर दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन शुरू किया था। उसके बाद बंगाली समुदाय की संख्या अधिक होने पर उन्होंने आयोजन को वृहद रूप देना शुस् कर दिया। धीरे-धीरे इस आयोजन को रेलवे के एनसीआर इंटर काॅलेज के प्रांगण में आयोजित किया जाने लगा।
नगर में होता है दर्जन भर स्थानों पर आयोजन
वैसे तो दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन पूरे जिले में ही किया जाता है लेकिन इस नगर में आयोजित होने वाला कार्यक्रम अन्य कार्यक्रमों से काफी अलग है। मां का विशाल पांडाल बनाया जाता है। जिसमें मां की प्रतिमाओं को विधि पूर्वक हवन यज्ञ के साथ स्थापित कराया जाता है। तीन दिन तक उनकी विशेष पूजा अर्चना की जाती है। दूर दराज से हजारों की संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शनों के लिए आते हैं।
15 दिन पहले शुरू होती है तैयारी
शारदीय नवरात्रों में होने वाले इस आयोजन की तैयारी 15 दिन पहले से शुरू हो जाती है। मूर्तिकार मूर्तियों को बनाने में व्यस्त रहते हैं तो कारीगर पांडाल को भव्य रूप प्रदान करने के लिए जुट जाते हैं। नगर के बीरी सिंह, विद्या संबंर्धिनी धर्मशाला, एटा रोड, शिव समाधि मंदिर, एमपी रोड, फ्रेंड्स क्लब, वाल्मीकि मंदिर, एनसीआर काॅलेज समेत लाइनपार और पचोखरा में दुर्गा पूजा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। तीन दिन तक समूचा नगर धर्म नगरी के रूप में परिवर्तित हो जाता है।
जगह-जगह होते हैं भंडारे
तीन दिन तक नगर मेें कई स्थानों पर भंडारों का आयोजन किया जाता है। पूरे नगर में ध्वनि विस्तारक यंत्र मां की महिमा का गुणगान करते नजर आते हैं। दशमीं को विधि विधान के साथ प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
रिपोर्ट-शुभम दुबे / रविन्द्र कुमा

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