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एटा मे सीओ ने अब एक और मामले में भेजी झूठी रिपोर्ट,सीएम के चाबुक के बाद भी अफसरों नहीं हो रहा सुधार

एसआईटी जांच को लेकर शासन ने एसएसपी से मांगी थी आख्या, सीओ ने किया गुमराह
खुफिया जांच में फर्जी निकला था मामला
एटा- कभी जमानत पर बाहर युवक को जेल में बताकर, तो कभी कलम की बाजीगरी से एसओ को बचाकर पुलिस महकमे की किरकिरी कराने वाले सीओ अलीगंज ने अब एक और मामले में झूठी रिपोर्ट शासन को भेज दी है। शासन ने सपा सरकार में दर्ज झूठे मुकदमे की एसआईटी जांच को लेकर एसएसपी से आख्या मांगी थी मांगी गई आख्या में सीओ ने झूठी, परन्तु सीओ ने झूठी, गुमारहात्मक रिपोर्ट भेज दी। कार्यालय की चारदीवारी में बैठकर तैयार की गई झूठी रिपोर्ट को अफसरों ने भी आंखें मूंदकर स्वीकार कर लिया और  सहमति की रिपोर्ट शासन को भेज दी। शासन स्तर पर भी फर्जी रिपोर्ट स्वीकार कर प्रार्थना पत्र निस्तारित कर दिया गया। जबकि खुफिया जांच में मुकदमा फर्जी निकला था। इसके बाद भी अफसरों ने इसको लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। जबकि सीएम योगी आदित्यनाथ लापरवाह अधिकारियों पर कड़ा कड़ी कार्यवाही रहे हैं। जिसकी बानगी महराजगंज में हुई कार्यवाही में देखने को मिलती है। फिर अफसर सीओ पर मेहरबानी बरसा रहे हैं। संवेदनहीनता को लेकर सीओ के साथ- साथ अफसरों की भूमिका भी सवालों के घेरे आ गई है।
   प्रदेश का निजाम बदलते ही पुलिस मुखिया भी बदल गए, परन्तु पुलिस की कार्यप्रणाली नहीं बदली। उसका काम करने का तरीका वही पुराना है। कार्यालय की चारदीवारी में बैठकर शिकायतों का फर्जी निस्तारण करना उनकी आदत में शुमार हो गया है । मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आईजीआरएस की समीक्षा के दौरान कई जिलों के डीएम और एसएसपी को सख्त निर्देश भी दे चुके हैं, परन्तु सीओ अलीगंज पर उनके आदेशों का कोई असर नहीं है। जबकि फर्जी निस्तारणों को लेकर मुख्यमंत्री कई बार अफसरों से नाराजगी जताकर जवाब-तलब भी कर चुके हैं। लापरवाही पर अफसर निलंबित भी कर रहे हैं।
    दरअसल,जैथरा के मीडियाकर्मी सुनील कुमार ने शासन से झूठे मुकदमे में फंसाये जाने की जांच सक्षम एजेंसी से कराए जाने का अनुरोध किया था। जिस पर गंभीर शासन ने एसआईटी से जांच कराए जाने को लेकर एसएसपी से आख्या तलब की थी। एसएसपी ने एक अगस्त को आदेश देकर सीओ अलीगंज से आख्या मांग ली। सीओ अलीगंज ने जांच नियमों को दरकिनार कर कार्यालय की चारदीवारी में बैठकर आनन-फानन में झूठी, भ्रामक और गुमारहात्मक आख्या तैयार कर एसएसपी को भेज दी। एसएसपी ने भी अधीनस्थ सीओ की आख्या पर आँखें मूंदकर 3 अगस्त को अपनी सहमति प्रदान कर आख्या उच्च स्तर पर भेज दी। सीओ ने प्रार्थना पत्र के सम्बंध में कोई साक्ष्य संकलन तो दूर, न तो आवेदक का कोई बयान दर्ज किया और न ही स्थलीय जांच कर कोई पड़ताल की। प्रार्थना पत्र में अंकित तथ्यों को लेकर कोई गहन और विस्तृत जांच तक नहीं की। सिर्फ जांच के नाम पर कोरम पूरा कर दिया। सीओ अलीगंज ने अपनी जांच में मीडियाकर्मी पर 23 जून, 2016 को एफआईआर दर्ज होकर 24 जून, 2016 को गिरफ्तार किया जाना अंकित किया है, जबकि पीड़ित को कथित घटना के आरोप में 23 जून की सुबह उसके भतीजे की दुकान से उठाया गया था। पुलिस जीडी के अनुसार कथित गिरफ्तारी 23 जून को रात्रि 10 बजकर 10 मिनट पर हुई है। इसी तरह जेल भेजे जाने को लेकर भी द्विअर्थी भाषा का इस्तेमाल कर अफसरों को गुमराह किया गया है। इससे स्पष्ट नहीं हो रहा है कि आवेदक वर्तमान में जेल में है या जमानत पर। सीओ ने प्रार्थना पत्र में अंकित अन्य आरोपों को असत्य और निराधार बताया है, जबकि अभिलेख आरोपों के सत्य होने की गवाही दे रहे हैं। शासन ने आवेदक के प्रार्थना पत्र पर एसआईटी से जांच को लेकर आख्या मांगी थी और सीओ कानूनी कार्यवाही के अनुरोध का कथन लिख रहे हैं। सीओ ने विवेचना की गंभीर खामियों को भी अफसरों के समक्ष प्रकट नहीं किया है। इसके अलावा महत्वपूर्ण बात यह यह कि प्रार्थना पत्र में एसएसपी व एएसपी स्तरीय अधिकारी पर भी गंभीर आरोप लगे हैं, बावजूद इसके एसएसपी ने वरिष्ठ की जांच कनिष्ठ को सौंपकर जांच को मजाक बना दिया। सीओ की जांच रिपोर्ट से साफ हो रहा है कि उन्होंने न तो प्रार्थना पत्र का अवलोकन किया और न ही अभिलेखों का परीक्षण किया है। आख्या में अभिलेखों के परीक्षण, जांच व छानबीन के कथन मनगढंत साबित हो रहे हैं। अखिलेश की पुलिस तो फर्जी निस्तारण करती ही थी,परन्तु योगी की पुलिस उससे भी चार कदम आगे निकलती जा रही है। सत्य को सत्य लिखने में योगी की पुलिस के सांसें फूल रही हैं, जबकि सीएम योगी निष्पक्षता व पीड़ितों को न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अखिलेश सरकार के कार्यों की जांच कराकर भ्रष्टाचार व अनुचित कार्यों का विरोध कर दागी अफसर व कर्मचारियों पर शिकंजा कस रहे हैं, वहीं सीएम योगी की पुलिस अखिलेश सरकार की पुलिस के नक्शे कदम पर चलकर सपा सरकार में दर्ज झूठे मुकदमे की निष्पक्ष जांच कराने की संस्तुति करने से भी कतरा रही है। बताते चलें खुफिया विभाग की जांच में मामला फर्जी पाया गया था।
लखनऊ से लेकर अलीगंज तक 6 दिन में पूरी हो गई जांच
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एटा- इस मामले की जांच भी हाईस्पीड में की गई। शासन से प्रार्थना पत्र 1अगस्त को डीआईजी को भेजा जाता है। डीआईजी भी एक अगस्त को ही एसएसपी को प्रार्थना पत्र भेजकर आख्या मांग लेते हैं। एसएसपी भी एक अगस्त को ही सीओ अलीगंज को भेजकर आख्या तलब कर लेते हैं। सीओ ने भी अफसरों से चार कदम आगे निकलकर आनन-फानन में जांच की खानापूर्ति कर आख्या एसएसपी को भेज दी। एसएसपी भी 3 अगस्त को ही आख्या से सहमत होकर उसे उच्च स्तर पर स्वीकृति हेतु भेज दिया। जिसके बाद उच्च अफसर 6 अगस्त को उसे स्वीकार कर शिकायत निस्तारित कर उसका मैसेज आवेदक को दर्ज मोबाइल पर भेज देते हैं। आनन-फानन में तैयार जांच रिपोर्ट पर सीओ दिनांक डालना भी भूल गए। जांच की तत्परता से अफसरों की गंभीरता, निष्पक्षता भी सवालों के घेरे में आ गई है। इससे यह भी स्पष्ट हो रहा कि अफसर न तो शिकायतों के प्रति गंभीर हैं और न ही जांच के प्रति। उनके द्वारा पदीय कर्तव्यों व दायित्वों में घोर लापरवाही बरती जा रही है। सभी अफसर खानापूर्ति में जुटे हैं। यही कारण है कि पीड़ितों को सीएम के जनता दरबार में पहुंचकर न्याय की गुहार लगानी पड़ रही है। वहीं पुलिस अधिकारी इस घटना के सच को अफसरों व शासन के समक्ष नहीं भेज रहे हैं।
क्या था मामला
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कस्बा जैथरा के मीडियाकर्मी सुनील कुमार ने गत वर्ष 18 जून 2016 को पुलिस की अवैध वसूली का वीडियो वायरल कर दिया था। तत्कालीन पुलिस कप्तान ने दोनों पुलिसकर्मियों को लाइनहाजिर कर दिया था। जिसके बाद जैथरा पुलिस ने अपना बदला लेने को षणयंत्र के तहत एक लड़की को मोहरा बनाकर मीडियाकर्मी को झूठा मुकदमा लगाकर जेल भेज दिया था।
भाजपाइयों ने किया था थाना का घेराव
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एटा- मीडियाकर्मी को झूठे मुकदमे में जेल भेजे जाने के विरोध में भाजपा के फर्रुखाबाद सांसद मुकेश राजपूत व वर्तमान विधयाक सत्यपाल सिंह राठौर ने  सैकडों भाजपाइयों के साथ कस्बा में जुलूस निकालकर थाना का घेराव किया किया था। भाजपाइयों ने मीडियाकर्मी पर दर्ज झूठे मुकदमे को रद्द करने व दोषी पुलिस अफसरों पर कार्यवाही की मांग की थी, परन्तु अखिलेश की पुलिस ने उस समय कुछ नहीं किया। सांसद मुकेश राजपूत व वर्तमान विधायक सत्यपाल सिंह राठौर ने मीडियाकर्मी से जेल में बार मुलाकात भी की थी। इसके अलावा कांग्रेसियों ने भी ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
मीडियाकर्मियों ने भी किया था प्रदर्शन
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मीडियाकर्मी पर दर्ज झूठे मुकदमे का विरोध आस-पास के जनपदों में भी हुआ था। जिला मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन कर तत्कालीन एसओ का पुतला भी फूंका गया था। जगह-जगह प्रदर्शन कर अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर सक्षम एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई। इसके बाद भी अफसर चुप्पी साधे बैठे रहे। जबकि खुफिया जांच में मामला फर्जी पाया गया था। अखिलेश की पुलिस अफसरों को झूठी रिपोर्ट भेजकर गुमराह करती रही और सच्चाई छिपाती रही और यही कार्य अब योगी की पुलिस करती नजर आ रही है।
रिपोर्ट-सुनील कुमार

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