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एटा में सीओ ने दिखाई कलम की बाजीगरी,ट्रेक्टर फर्जीवाड़े का एचसीपी के सिर मढ़ा सारा दोष

पुनः विवेचना करने वाले दरोगा को नहीं बनाया दोषी
एटा- दागी दरोगा पर मेहरबानी बरसाने का सिलसिला योगी सरकार में भी कम नहीं हो रहा है। जमानत पर चल रहे युवक को जेल में बताने वाले सीओ ने अब दागी दरोगा की जांच में कलम की बाजीगरी दिखा दी। एक समान अपराध में एचसीपी के सिर सारा दोष मढ़ दिया,वहीं दरोगा का कोई उत्तरदायित्व तक तय नहीं किया। जबकि दरोगा ने एचसीपी से अधिक गंभीर कृत्य किया है। जांच रिपोर्ट एसएसपी को भेजी गई है। दरोगा पर मेहरबानी को लेकर पुलिस अधिकारियों की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में आती जा रही है।
      दरोगा कैलाश चंद्र दुबे पर मेहरबानी बरसाने वाले अफसरों का काला चिट्ठा जांच रिपोर्टों में सामने आता जा रहा है। तत्कालीन सीओ के बाद वर्तमान सीओ अजय सिंह भदौरिया की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। जैथरा थानाक्षेत्र के ट्रेक्टर बदलने वाले मामले में की गई जांच में नया खुलासा हुआ है। एसएसपी को भेजी गई रिपोर्ट के निष्कर्ष में लिखा गया है कि थाना जैथरा पर 19 फरवरी, 2016 को दर्ज कराए गए मुकदमे की विवेचना तत्समय थाना जैथरा पर नियुक्त एचसीपी चंद्रपाल सिंह द्वारा नियम/ कानूनों की अनदेखी कर त्रुटिपूर्ण ढंग से की गयी है। इसलिए एचसीपी पूर्ण रूप से दोषी हैं एवं तत्कालीन थानाध्यक्ष जैथरा कैलाश चंद्र दुबे द्वारा भी पुनः विवेचना के मध्य 31 मार्च,2016 को प्रेषित प्रार्थना पत्र के तथ्यों को सरसरी तौर पर लिया गया है। यहीं पर जांच अधिकारी सीओ अलीगंज ने अपनी कलम की बाजीगरी दिखाते हुए शब्दों में खेल कर दिया। सीओ ने अपनी जांच रिपोर्ट में एचसीपी के लिए पूर्ण रूप से दोषी शब्द का प्रयोग किया, वहीं दरोगा कैलाश चंद्र के लिए इस शब्द का प्रयोग तक नही किया। जबकि पुनः विवेचना में दरोगा कैलाश चंद्र ने एचसीपी की विवेचना का समर्थन कर वहीं कृत्य किया, जो एचसीपी ने विवेचना के समय किया था। दरोगा ने पुनः विवेचना के समय  न तो वादी के फर्जी प्रार्थना पत्र की तस्दीक की और न ही घटना के असली का ट्रेक्टर पता लगाकर आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया। जबकि घटना का ट्रेक्टर बदलने का मामला तत्कालीन सीओ आशाराम अहिरवार की जांच के समय ही दरोगा के संज्ञान में आ गया था। बावजूद इसके दरोगा ने पुनः विवेचना में वही गंभीर खामियां कीं, जो एचसीपी ने कीं। पूरे प्रकरण में दरोगा की घोर लापरवाही परिलक्षित हो रही है। बावजूद इसके सीओ ने दोषी जैसा शब्द तक प्रयुक्त नहीं किया है। जबकि दरोगा ने शासनादेश व डीजीपी के आदेश को ताक पर एचसीपी को विवेचना सौंपी थी। पुलिस रेगुलेशन के अनुसार थाने की जीडी की जिम्मेदारी थानाप्रभारी की होती है। उसके आदेश पर ही जीडी लिखी जाती है। जीडी में लिखी जाने वाली हर बात की जानकारी एसओ की होती है। थानाप्रभारी जीडी का अवलोकन कर यही प्रमाणित करते हुए उस पर हस्तक्षर करता है। जीडी थानाप्रभारी के आदेश पर ही लिखी जाती है। चूंकि घटना में शामिल ट्रेक्टर जीडी में दाखिल किया गया था। उसके  बाद बदला गया था। इसके लिए थानाध्यक्ष की जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता है। परन्तु सीओ ने अपनी जांच में दरोगा की भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट मत अंकित नहीं किया है। सरसरी जैसे शब्द का इस्तेमाल कर दरोगा को बचा दिया है।
क्या है मामला
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जैथरा थानाक्षेत्र के एक गांव निवासी दिनेश कुमार की पुत्री प्रियंका की 19 फरवरी, 2016 को ट्रेक्टर से कुचलकर मौत हो गई थी। घटना की रिपोर्ट नगला कंचन निवासी शीलेन्द्र पुत्र विजय प्रताप के विरूद्ध दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने मौके से ट्रेक्टर कब्जे में लेकर थाने में दाखिल करा दिया था। 40 दिन बाद एसओ ने आरोपियों से मिलकर वादी के नाम व हस्तक्षर से फर्जी प्रार्थना पत्र तैयार कर दूसरा ट्रेक्टर लगा दिया था। शिकायत पर तत्कालीन एसएसपी ने जांच के आदेश दिए थे।
रिपोर्ट- सुनील कुमार, एटा ।

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